Saturday, October 7, 2017

Pasand ya Jarurat

"पसंद या जरुरत"

अक्सर लोगों की जो पसंद होती है, वो उनकी जरुरत नहीं होती और जो उनकी जरुरत होती है, वो उनकी पसंद नहीं होती।

क्यों? क्योंकि अक्सर उन्हें पता ही नहीं होता कि, उनकी जरुरत क्या है। अक्सर पूंजीपति वर्ग, अपनी कुत्सित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, उन्हें भरमाये रहता है। हम जानते हैं कि, सारा प्रचार तंत्र पूंजीपतियों के अधीन है, जिनमें से अधिकांश अपने तुच्छ स्वार्थ की पूर्ति के लिए या अज्ञानतावश किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

तो आइये, हम मूल विषय पर लौटते हैं।

आखिर लोगों की जरुरत क्या है और उन्हें पसंद क्या है?

"संघर्ष" ही जरुरत है और "पलायन" ही पसंद है।

उदहारण के लिए आपने इल्ली और तितली वाली कहानी सुनी होगी, जिसमें इल्ली के अकथनीय संघर्ष को देखकर, एक छात्र को दया आ गयी और उसने झिल्ली को फाड़कर इल्ली की मदद कर दी और बाहर निकलते ही इल्ली की मृत्यु हो गयी। प्रोफेसर जो छात्रों केवल देखते रहने और छूने से मना करके बाहर गए हुए थे, वापस लौटने पर लज्जित छात्र को समझाए कि, तूने इस पर दया नहीं की बल्कि, इसकी हत्या कर दी।
तुमने इसका संघर्ष छीन लिया जो इसके फेफड़ों, डैनों और अन्य अंगों के विकास के लिए, आवशयक था। उसी संघर्ष से इसे बाहरी दुनिया में जीने के लायक "शक्ति" मिलने वाली थी।

याद रखिये, "संघर्ष से ही शक्ति मिलती है"।

ठीक इसी प्रकार, जब किसी को बुखार या कोई अन्य तीव्र रोग (acute diseases) होते हैं, जो अक्सर तात्कालिक होते हैं, तो हमें संघर्ष के लक्षण दिखाई देते हैं। आम तौर पर, बिना दवा के ही, कुछ परहेजों से ही ये लक्षण कुछ घंटों या दिनों में स्वयं समाप्त हो जाते हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास हो जाता है, जो आने वाले कई जीर्ण रोगों (chronic diseases) से बचाता है।

लेकिन होता क्या है?

लोग रोगों को दबाने वाली चिकित्सा (palliative treatment) करते हैं जो तत्काल तो बहुत ही पसंद आता है, लेकिन बाद में बहुत ही नापसंद परिणाम आते हैं।

रोगों को दबाते दबाते एक सीमा के बाद जब और दबाना संभव नहीं होता तो "रोगों को बाहर निकलने वाली चिकित्सा" (curative treatment) की ओर लौटना ही पड़ता है। तबतक बहुत ही देर हो चुकी होती है और एक एक करके दबे हुए रोगों को बाहर निकालने में समय लगना स्वाभाविक ही है। लेकिन होता यह है कि, एक तो रोगी का धैर्य समाप्त हो चुका होता है और उसका तन-मन-धन तीनों कमजोर पड़ चुका होता है। ऊपर से जिस संघर्ष से उसे भागने की आदत पड़ चुकी होती है, उसी से उसे लगातार गुजरना पड़ता है।

यह स्थिति चिकित्सक के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण होती है। एक तो सत्य को समझना मुश्किल होता है, ऊपर से समझाना तो और भी मुश्किल। रोगी की स्थिति भी ऐसी होती है कि, वह "अनुचित अपेक्षा" रखता है, जो संसार के सभी दुखों का एकमात्र कारण है।

निष्कर्ष यह कि, जो चिकित्सा लोगों को पसंद है, वो रोगों को दबाने वाली चिकित्सा अर्थात palliative treatment है और जो लोगों की जरुरत है, वो रोगों को बाहर निकालने वाली चिकत्सा अर्थात curative treatment है।

बेहतर यह है कि, समय रहते जरुरत को पहचान लिया जाय तो यही पसंद में बदल जायेगी।

ध्यान रहे, "सत्य वह मार्ग है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है"।

Friday, May 5, 2017

final movie flv 1



Must see video for every homeopath.

और हाँ , यह विडियो हिंदी में है ...

Thursday, February 23, 2017

होमियोपैथी क्या है?

होमियोपैथी क्या है?
What is Homeopathy?

अगर एक पंक्ति में कहा जाए तो होमियोपैथी “आदर्श उपचार” (Model Cure) की एकमात्र पद्धति है।
आदर्श उपचार क्या है?
वह उपचार जो रोगी को स्वास्थ्य की प्रकृतिक अवस्था में पुनः स्थापित कर दे। अर्थात वह अवस्था जिसमें रोगी को किसी भी दवा की कोई भी जरुरत नहीं रहे। यहाँ तक कि उसे रोग का स्मरण भी नहीं रहे। इसे “state of freedom” कह सकते हैं। अर्थात पूर्ण मुक्ति।

आप जो उपचार ले रहे हैं, वह आदर्श उपचार है या नहीं, कैसे जानेंगे? उपचार के दौरान क्या होना चाहिए? इसे समझने के लिए हमें यह समझना पड़ेगा...

Saturday, April 9, 2016

BIRTHDAY OF HAHNEMANN

 By J. T. Kent - Lesser Writings...

It naturally comes into our minds to celebrate the birthday of Samuel Hahnemann on the eleventh day of April.

Some will do this by a banquet, some by speeches, some by silent heart-throbs. Some will celebrate openly and outwardly, while in secret they administer tinctures in physiological doses and compound tablets, and alternate two medicines, neither of which is related to the sickness in hand.

The silent, heartfelt thankfulness that Hahnemann was born and lived his life and left us the results of his discoveries in the ORGANON, CHRONIC DISEASES and MATERIA MEDICA PURA, is the best way to celebrate this wonderful man's birthday.

Hahnemann fulfilled his usefulness, and no man ever took his place. This is true of all great and useful men. Every man that does his utmost in useful work leaves no one to do his work. Every man must seek his own work and do it; men fail when they try to fulfill another man's work.

Many great men have followed Hahnemann; each has done his own work. Men have become great in Homoeopathy in following the principles laid down in Hahnemann's ORGANON, in teaching, translating, compiling, and prescribing, but not a single man has become noted by using tinctures, compound tablets, or ignoring the doctrines of potentization. Some of these have become noted politicians, but none of them have been noted teaching the Philosophy or the Materia Medica.

The men who have been noted teachers in our Materia Medica have been men who have openly stood for the principles of potentization, the single remedy, the similar remedy, and all the principles found in the ORGANON.

All such men will celebrate the birthday of Samuel Hahnemann; many others will make speeches, and eat and drink and be merry.

Hail Hahnemann….🙏
Hail Homeopathy….🙏

Wednesday, December 23, 2015

Nature's Law of Cure

What is nature's law of cure?
Before coming directly to the point, let's take a brief tour of the history.
When Master Hahnemann left his Allopathic practice, after being completely dissatisfied by it, he began translating medical scriptures, for his butter and bread.
In 1790, when Hahnemann was engaged in translating Cullen's Materia Medica from English to German, he
became dissatisfied by the remark of the author that, cinchona bark cures malaria due to its bitter taste. He thought that several other substances also have bitter taste and every bitter thing can't have the same effect. His logical and scientific mind couldn't accept it.
For the purpose of verification, Hahnemann himself ingested 4 drams of cinchona juice twice daily for few a days.
Amazingly, he was attacked by symptoms very similar to ague or malarial fever. He conducted similar experiments on himself and other healthy individuals with other medicines.
As a conclusion he found that, a medicine can cure a disease, because it can produce a similar disease, in healthy individuals.
By this discovery the law of simillia established.
"Similia Similibus Curantur"
Thus the nature's law of cure, "Similia Similibus Curantur", which means similar cures similar or like cures like became discovered.
The whole of Homoeopathy derives from this law of nature.
Later he found that the medicine should be slightly stronger than the disease. Hence the methods of potentisation or dynamization invented.
So the nature's law of cure is, "a similar and stronger disease can cure a similar and weaker disease".
All of 7 Cardinal Principles of Homoeopathy are based upon this law of natural cure.
Nature never changes its laws.
They are universal truth. As laws of motion, law of gravitation can't be changed by the time, so the nature's law of cure can't be changed and will remain effective all the time.
Without following the laws of nature, no one can achieve the true success. Without following the nature's law of cure, no one can achieve true cure...
This post was originally posted upon my blog, "Homoeo Miracle"

Monday, December 21, 2015

The Biggest Danger सबसे बड़ा खतरा

नहीं मैं terrorism की बात नहीं कर रहा हूँ। न ही global warming या pollution की।

आजकल सारी दुनियां आतंकवाद को ही सबसे बड़ा खतरा मान कर चल रही है।

ग्लोबल वार्मिंग और प्रदुषण भी लोगों को चिंतित कर रहे हैं।

लेकिन मैं जिस खतरे की बात कर रहा हूँ, वह इन सारे खतरों से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होने वाला है। ये खतरा, जो महज कुछ सालों के अंदर मानव जाति के ऊपर सबसे भयानक आक्रमण करने वाला है। दस्तक तो इसने दे ही दिया है।

ये आसन्न खतरा, आतंकवाद से भी बड़ा आतंकवादी साबित होने वाला है। क्योंकि, जितनी तेजी से और जितने बड़े पैमाने पर, जनसंहार इस खतरे से हो सकता है, दुनियां के सारे आतंकवादी मिलकर भी इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते।

और यह खतरा, किसी एक देश, जाति, संप्रदाय या क्षेत्र के लोगों का ही संहार नहीं करने जा रहा है। बल्कि पूरी दुनियां के कोने कोने में व्यापक रूप से फैलने जा रहा है।

आशंका है कि 2-4 साल के अंदर दुनियां के लोग, इसके बारे में ही सबसे ज्यादा बातें करेंगे और विश्व मानव समुदाय, एकजुट होकर इससे निबटने के उपाय ढूंढेगा।

उस समय एक मात्र उपाय वही बचेगा, जो आज से लगभग ढाई सौ वर्ष पहले ही, एक महामानव के माध्यम से मानवजाति को मिल चुका था। और उस महामानव ने कहा था कि, "सर्वशक्तिमान ईश्वर की दया से, मैंने यह उपचार का प्राकृतिक नियम प्रकट किया है"।

चलिये अब इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हैं।

"एंटीबायोटिक युग का अंत" !!!

दुनियां भर में तथाकथित आधुनिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोग परेशान हैं कि, उनके एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रहे हैं। सूक्ष्मजीव उनके एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं और उनके सबसे खतरनाक एंटीबायोटिक्स भी कुछ बैक्टिरिया को नहीं मार पा रहे हैं।

जैसे जैसे एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बढ़ता गया, वैसे वैसे सूक्ष्मजीवों की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती गयी। कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही था, क्योंकि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने की एक सीमा होती है और अंत में परिणाम बहुत ही भयावह होता है।

अब वैज्ञानिक जो नये नये एंटीबायोटिक्स की खोज में लगे रहते थे, "एंटीबायोटिक युग की समाप्ति" की घोषणाएं कर रहे हैं। दुनियां भर से ऐसी ख़बरें आ रही हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि, यह इसी साल या अगले साल हो सकता है।

जरा सोचिये, आज की दुनियां के अधिकांश चिकित्सक चाहे वो सर्जन हों या फिजिशियन, एंटीबायोटिक्स पर आश्रित हैं और जब यही बेअसर हो जायेंगे, तो उनके पास कोई चारा नहीं बचेगा।

जो सूक्ष्मजीव प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, वे पहले की तुलना में और भी ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं। जितनी ज्यादा शक्तिशाली एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता वो विकसित कर चुके होते हैं, उतने ही ज्यादा शक्तिशाली वो हो जाते हैं। इसीलिये उन्हें सुपरबग भी कहा जाता है। इनका प्रसारण और आक्रमण और भी भयावह तरीके से होता है।

आखिर ऐसा हुआ क्यों?

यह हुआ प्रकृति की कार्यपद्धति को नहीं समझ पाने और प्राकृतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की वजह से। तथाकथित पदार्थवादी (materialistic) विज्ञान ने जीव शरीर के संचालन में सूक्ष्म शरीर या जीवनी शक्ति के महत्त्व को नजरअंदाज कर दिया और सूक्ष्मजीवों को ही रोग का कारण समझ लिया। और वे जुट गए सूक्ष्मजीवों को मारने में। साधारण तर्कबुद्धि (common sense) को भी उन्होंने किनारे कर दिया कि, जब सूक्ष्मजीव ही रोगों के कारण हैं, तो हर व्यक्ति पर सूक्ष्मजीवों का एक जैसा प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? दरअसल, सूक्ष्मजीव तो शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया में सहायक होते हैं और जो सहायक नहीं होते हैं, उनके लिये प्राकृतिक व्यवस्था होती है।

वास्तव में रोगों का मूल कारण है, सूक्ष्म शरीर का अव्यवस्थित हो जाना, अर्थात् शरीर के अंदर जीवनी शक्ति का प्रवाह अव्यवस्थित हो जाना।

इसे पुनः व्यवस्थित करने के लिये सूक्ष्म दवाओं की आवश्यकता होती है, क्योंकि सूक्ष्म तक सूक्ष्म ही पहुँच सकता है।

आज तथाकथित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जिस नैनो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर शोध ही कर रहा है (एक बार फिर प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज करते हुए), उस सूक्ष्म तकनीक का प्रयोग होमियोपैथी में सदियों से होता आ रहा है, और वह भी प्रकृति के नियमों के अनुकूल।

आज भी असंख्य रोगी जिन पर स्थूल एलोपैथिक मात्राएँ बेअसर हो जाती हैं, वहां भी होम्योपैथिक सूक्ष्म शक्तियां अपना चमत्कार दिखलाती हैं।

तो या तो इंतजार कीजिये, जब हर किसी को होमियोपैथी की शरण में आना ही पड़ेगा या पहले से ही तैयार रहिये। क्योंकि बचाव हमेशा इलाज से बेहतर है। (prevention is always better than cure)

होम्योपैथिक दवाएं केवल उपचार ही नहीं करतीं, बल्कि आने वाले रोगों से बचाव भी करती हैं।

तो जल्द निर्णय लीजिये, कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाये।

याद रखिये, "सत्य वह उपाय है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है"

यह पोस्ट मूल रूप से मेरे इस ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ:

होमियो हिंदी
homoeohindi.blogspot.com