Wednesday, December 23, 2015

Nature's Law of Cure

What is nature's law of cure?
Before coming directly to the point, let's take a brief tour of the history.
When Master Hahnemann left his Allopathic practice, after being completely dissatisfied by it, he began translating medical scriptures, for his butter and bread.
In 1790, when Hahnemann was engaged in translating Cullen's Materia Medica from English to German, he
became dissatisfied by the remark of the author that, cinchona bark cures malaria due to its bitter taste. He thought that several other substances also have bitter taste and every bitter thing can't have the same effect. His logical and scientific mind couldn't accept it.
For the purpose of verification, Hahnemann himself ingested 4 drams of cinchona juice twice daily for few a days.
Amazingly, he was attacked by symptoms very similar to ague or malarial fever. He conducted similar experiments on himself and other healthy individuals with other medicines.
As a conclusion he found that, a medicine can cure a disease, because it can produce a similar disease, in healthy individuals.
By this discovery the law of simillia established.
"Similia Similibus Curantur"
Thus the nature's law of cure, "Similia Similibus Curantur", which means similar cures similar or like cures like became discovered.
The whole of Homoeopathy derives from this law of nature.
Later he found that the medicine should be slightly stronger than the disease. Hence the methods of potentisation or dynamization invented.
So the nature's law of cure is, "a similar and stronger disease can cure a similar and weaker disease".
All of 7 Cardinal Principles of Homoeopathy are based upon this law of natural cure.
Nature never changes its laws.
They are universal truth. As laws of motion, law of gravitation can't be changed by the time, so the nature's law of cure can't be changed and will remain effective all the time.
Without following the laws of nature, no one can achieve the true success. Without following the nature's law of cure, no one can achieve true cure...
This post was originally posted upon my blog, "Homoeo Miracle"

Monday, December 21, 2015

The Biggest Danger सबसे बड़ा खतरा

नहीं मैं terrorism की बात नहीं कर रहा हूँ। न ही global warming या pollution की।

आजकल सारी दुनियां आतंकवाद को ही सबसे बड़ा खतरा मान कर चल रही है।

ग्लोबल वार्मिंग और प्रदुषण भी लोगों को चिंतित कर रहे हैं।

लेकिन मैं जिस खतरे की बात कर रहा हूँ, वह इन सारे खतरों से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होने वाला है। ये खतरा, जो महज कुछ सालों के अंदर मानव जाति के ऊपर सबसे भयानक आक्रमण करने वाला है। दस्तक तो इसने दे ही दिया है।

ये आसन्न खतरा, आतंकवाद से भी बड़ा आतंकवादी साबित होने वाला है। क्योंकि, जितनी तेजी से और जितने बड़े पैमाने पर, जनसंहार इस खतरे से हो सकता है, दुनियां के सारे आतंकवादी मिलकर भी इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते।

और यह खतरा, किसी एक देश, जाति, संप्रदाय या क्षेत्र के लोगों का ही संहार नहीं करने जा रहा है। बल्कि पूरी दुनियां के कोने कोने में व्यापक रूप से फैलने जा रहा है।

आशंका है कि 2-4 साल के अंदर दुनियां के लोग, इसके बारे में ही सबसे ज्यादा बातें करेंगे और विश्व मानव समुदाय, एकजुट होकर इससे निबटने के उपाय ढूंढेगा।

उस समय एक मात्र उपाय वही बचेगा, जो आज से लगभग ढाई सौ वर्ष पहले ही, एक महामानव के माध्यम से मानवजाति को मिल चुका था। और उस महामानव ने कहा था कि, "सर्वशक्तिमान ईश्वर की दया से, मैंने यह उपचार का प्राकृतिक नियम प्रकट किया है"।

चलिये अब इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हैं।

"एंटीबायोटिक युग का अंत" !!!

दुनियां भर में तथाकथित आधुनिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोग परेशान हैं कि, उनके एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रहे हैं। सूक्ष्मजीव उनके एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं और उनके सबसे खतरनाक एंटीबायोटिक्स भी कुछ बैक्टिरिया को नहीं मार पा रहे हैं।

जैसे जैसे एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बढ़ता गया, वैसे वैसे सूक्ष्मजीवों की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती गयी। कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही था, क्योंकि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने की एक सीमा होती है और अंत में परिणाम बहुत ही भयावह होता है।

अब वैज्ञानिक जो नये नये एंटीबायोटिक्स की खोज में लगे रहते थे, "एंटीबायोटिक युग की समाप्ति" की घोषणाएं कर रहे हैं। दुनियां भर से ऐसी ख़बरें आ रही हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि, यह इसी साल या अगले साल हो सकता है।

जरा सोचिये, आज की दुनियां के अधिकांश चिकित्सक चाहे वो सर्जन हों या फिजिशियन, एंटीबायोटिक्स पर आश्रित हैं और जब यही बेअसर हो जायेंगे, तो उनके पास कोई चारा नहीं बचेगा।

जो सूक्ष्मजीव प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, वे पहले की तुलना में और भी ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं। जितनी ज्यादा शक्तिशाली एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता वो विकसित कर चुके होते हैं, उतने ही ज्यादा शक्तिशाली वो हो जाते हैं। इसीलिये उन्हें सुपरबग भी कहा जाता है। इनका प्रसारण और आक्रमण और भी भयावह तरीके से होता है।

आखिर ऐसा हुआ क्यों?

यह हुआ प्रकृति की कार्यपद्धति को नहीं समझ पाने और प्राकृतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की वजह से। तथाकथित पदार्थवादी (materialistic) विज्ञान ने जीव शरीर के संचालन में सूक्ष्म शरीर या जीवनी शक्ति के महत्त्व को नजरअंदाज कर दिया और सूक्ष्मजीवों को ही रोग का कारण समझ लिया। और वे जुट गए सूक्ष्मजीवों को मारने में। साधारण तर्कबुद्धि (common sense) को भी उन्होंने किनारे कर दिया कि, जब सूक्ष्मजीव ही रोगों के कारण हैं, तो हर व्यक्ति पर सूक्ष्मजीवों का एक जैसा प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? दरअसल, सूक्ष्मजीव तो शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया में सहायक होते हैं और जो सहायक नहीं होते हैं, उनके लिये प्राकृतिक व्यवस्था होती है।

वास्तव में रोगों का मूल कारण है, सूक्ष्म शरीर का अव्यवस्थित हो जाना, अर्थात् शरीर के अंदर जीवनी शक्ति का प्रवाह अव्यवस्थित हो जाना।

इसे पुनः व्यवस्थित करने के लिये सूक्ष्म दवाओं की आवश्यकता होती है, क्योंकि सूक्ष्म तक सूक्ष्म ही पहुँच सकता है।

आज तथाकथित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जिस नैनो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर शोध ही कर रहा है (एक बार फिर प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज करते हुए), उस सूक्ष्म तकनीक का प्रयोग होमियोपैथी में सदियों से होता आ रहा है, और वह भी प्रकृति के नियमों के अनुकूल।

आज भी असंख्य रोगी जिन पर स्थूल एलोपैथिक मात्राएँ बेअसर हो जाती हैं, वहां भी होम्योपैथिक सूक्ष्म शक्तियां अपना चमत्कार दिखलाती हैं।

तो या तो इंतजार कीजिये, जब हर किसी को होमियोपैथी की शरण में आना ही पड़ेगा या पहले से ही तैयार रहिये। क्योंकि बचाव हमेशा इलाज से बेहतर है। (prevention is always better than cure)

होम्योपैथिक दवाएं केवल उपचार ही नहीं करतीं, बल्कि आने वाले रोगों से बचाव भी करती हैं।

तो जल्द निर्णय लीजिये, कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाये।

याद रखिये, "सत्य वह उपाय है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है"

यह पोस्ट मूल रूप से मेरे इस ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ:

होमियो हिंदी
homoeohindi.blogspot.com

Homoeopathy & Allopathy होमियोपैथी और एलोपैथी

क्या होमियोपैथी और एलोपैथी इलाज एक साथ चल सकता है?

कुछ लोग कहते हैं कि, होम्योपैथीक दवाएं अन्य किसी भी तरह की दवा के साथ दी जा सकती हैं! मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ।

पहले हमें समझ लेना चाहिये कि, इलाज की 2 पद्धतियाँ हैं, Curative Treatment और Palliative Treatment. अर्थात् रोग को जड़ से बाहर कर देने वाली चिकित्सा पद्धति और रोग को दबाने वाली चिकित्सा पद्धति।

आदर्श उपचार वह है, जो रोग को जड़ से बाहर कर दे और स्थायी आरोग्य प्रदान करे, न कि रोग को दबा दे। क्योंकि कोई भी रोग दबने पर ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग में चला जायेगा और ज्यादा गंभीर रोग का कारण बनेगा। तत्काल तो रोगी को आराम महसूस होगा लेकिन बाद में कई गुना ज्यादा कष्ट भोगना पड़ेगा।

अब देखिये कि होम्योपैथीक इलाज का मतलब ही है आदर्श उपचार, अर्थात् Curative Treatment. यह पद्धति "Nature's Law of Cure", उपचार के प्राकृतिक नियम पर आधारित है। इस इलाज से रोग ऊपर से नीचे, अंदर से बाहर और नए से पुराने की और खिसकता है। यानि कि प्राकृतिक रूप से रोग, जड़ समेत बाहर निकलता है। जबकि Palliative Treatment में बिलकुल इसका उल्टा होता है। एलोपैथी में रोग को दबाने वाली चिकित्सा ही की जाती है और रोग बिलकुल गलत दिशा में खिसकता है। यानि कि "shifting of the disease, happens in wrong direction".

अब आप ही बताइये, 2 एक दूसरे के विपरीत पद्धतियों का प्रयोग, 1 ही शरीर में, 1 ही साथ, कैसे उचित हो सकता है? जबकि दोनों की क्रिया एक-दूसरे की विपरीत दिशा में होती है।

कुछ विरल परिस्थितियों में मास्टर हैनिमैन ने, Palliative Treatment की अनुमति दी है, जिसका तात्पर्य एलोपैथी की स्थूल दवाओं से कदापि नहीं है। वास्तव में होम्योपैथीक सूक्ष्म दवाओं से antidote करना भी Palliative Treatment ही है, लेकिन इससे स्थूल दवाओं की तरह दुष्प्रभाव नहीं होते।

प्रायोगिक तौर पर देखा गया है कि, जिन रोगियों की वर्तमान रोगवस्था, होम्योपैथीक उपचार से आरोग्य की ओर अग्रसर थी और कोई पुराना दबा हुआ रोग बाहर निकलने लगा (हो सकता है, उसी की वजह से वर्तमान रोग हुआ था), रोगी ने उसे अन्य रोग समझ कर अन्य चिकित्सक से फिर एलोपैथिक दवा ले ली। उसके कुछ दिनों बाद फिर लौट कर होम्योपैथीक चिकित्सक के पास आया, क्योंकि उसका रोग वापस आ गया था। दुबारा होम्योपैथीक इलाज भी उतनी जल्दी काम नहीं करता, क्योंकि अब रोग और भी ज्यादा जटिल (complicated) हो गया था। इस बार समय और प्रयास और भी ज्यादा लगेगा और आरोग्य लाभ होने की सम्भावना भी क्षीण हो जायेगी।

इसीलिये मेरी सलाह यही है कि, होम्योपैथीक इलाज करवाने से पहले इसे समझें।

अगर आपने अपने शरीर को पूर्णतः रोगमुक्त करने का निर्णय लिया है, यानि शरीर में दबे हुए सभी रोगों को बाहर निकालने का निर्णय लिया है, इतना ही नहीं सूक्ष्म-शरीर के स्तर पर भी विकार रहित करने का निर्णय लिया है, तभी एक अच्छे होम्योपैथीक फिजिशियन से संपर्क करें और एक बार होम्योपैथीक इलाज शुरू करने के बाद अन्य कोई भी दवा नहीं लें। यहाँ तक कि बाहरी प्रयोग वाली दवा या घरेलु इलाज भी। अन्यथा रोग को बाहर निकालने की प्रक्रिया में व्यवधान पड़ेगा, जीवनी शक्ति और भी असंतुलित हो जायेगी तथा रोग और भी जटिल हो जायेगा।

अगर आप धीरज और विश्वास के साथ होमियोपैथी में टिके रहेंगे तो एक एक करके आपके अंदर दबी हुई बीमारियां, परत दर परत बाहर निकल जाएंगी और आने वाली भयंकर बीमारियों से बचाव भी होगा।

यह पोस्ट मूल रूप से मेरे इस ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ:

होमियो हिंदी http://homoeohindi.blogspot.com

Sunday, November 29, 2015

Most Dangerous

"The safest may become the most dangerous"

Homoeopathic dynamic remedies are the safest remedies, if used properly, but most dangerous, if repeated frequently, in high potencies.

Remember, the "law of minimum" must be followed.

Even 30c is a very high potency. 6c is also very powerful. One dose of 6c brings miracles, if selected Homeopathically.

It means, highest potencies, repeating frequently, can't be justified, as proper use.

Model Cure आदर्श उपचार

Herring's 3 laws of model cure..
हेरिंग के आदर्श उपचार के 3 नियम...

1. Shifting of the disease must be upwards to downwards.
(from more vital organ to less vital organ)

रोग ऊपर से नीचे की ओर ही खिसकना चाहिये।
(ज्यादा महत्त्वपूर्ण अंग से कम महत्त्वपूर्ण अंग की ओर)

2. Shifting of the disease must be inwards to outwards.

रोग अंदर से बाहर की ओर ही खिसकना चाहिये।

3. Shifting of the disease must be in the reverse direction of the chronological order of appearance.
(Newer earlier, older later)

रोग जिस क्रम में प्रकट हुए हैं, उसके विपरीत क्रम में ही खिसकना चाहिये।
(नये पहले, पुराने बाद में, और भी पुराने और बाद में)

Now you can check, your case is tending to model cure, or not.

अब आप जाँच सकते हैं कि, आपका मामला, आदर्श  उपचार की ओर जा रहा है, या नहीं।