Monday, December 21, 2015

The Biggest Danger सबसे बड़ा खतरा

नहीं मैं terrorism की बात नहीं कर रहा हूँ। न ही global warming या pollution की।

आजकल सारी दुनियां आतंकवाद को ही सबसे बड़ा खतरा मान कर चल रही है।

ग्लोबल वार्मिंग और प्रदुषण भी लोगों को चिंतित कर रहे हैं।

लेकिन मैं जिस खतरे की बात कर रहा हूँ, वह इन सारे खतरों से कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होने वाला है। ये खतरा, जो महज कुछ सालों के अंदर मानव जाति के ऊपर सबसे भयानक आक्रमण करने वाला है। दस्तक तो इसने दे ही दिया है।

ये आसन्न खतरा, आतंकवाद से भी बड़ा आतंकवादी साबित होने वाला है। क्योंकि, जितनी तेजी से और जितने बड़े पैमाने पर, जनसंहार इस खतरे से हो सकता है, दुनियां के सारे आतंकवादी मिलकर भी इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते।

और यह खतरा, किसी एक देश, जाति, संप्रदाय या क्षेत्र के लोगों का ही संहार नहीं करने जा रहा है। बल्कि पूरी दुनियां के कोने कोने में व्यापक रूप से फैलने जा रहा है।

आशंका है कि 2-4 साल के अंदर दुनियां के लोग, इसके बारे में ही सबसे ज्यादा बातें करेंगे और विश्व मानव समुदाय, एकजुट होकर इससे निबटने के उपाय ढूंढेगा।

उस समय एक मात्र उपाय वही बचेगा, जो आज से लगभग ढाई सौ वर्ष पहले ही, एक महामानव के माध्यम से मानवजाति को मिल चुका था। और उस महामानव ने कहा था कि, "सर्वशक्तिमान ईश्वर की दया से, मैंने यह उपचार का प्राकृतिक नियम प्रकट किया है"।

चलिये अब इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हैं।

"एंटीबायोटिक युग का अंत" !!!

दुनियां भर में तथाकथित आधुनिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोग परेशान हैं कि, उनके एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रहे हैं। सूक्ष्मजीव उनके एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहे हैं और उनके सबसे खतरनाक एंटीबायोटिक्स भी कुछ बैक्टिरिया को नहीं मार पा रहे हैं।

जैसे जैसे एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बढ़ता गया, वैसे वैसे सूक्ष्मजीवों की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती गयी। कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही था, क्योंकि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने की एक सीमा होती है और अंत में परिणाम बहुत ही भयावह होता है।

अब वैज्ञानिक जो नये नये एंटीबायोटिक्स की खोज में लगे रहते थे, "एंटीबायोटिक युग की समाप्ति" की घोषणाएं कर रहे हैं। दुनियां भर से ऐसी ख़बरें आ रही हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि, यह इसी साल या अगले साल हो सकता है।

जरा सोचिये, आज की दुनियां के अधिकांश चिकित्सक चाहे वो सर्जन हों या फिजिशियन, एंटीबायोटिक्स पर आश्रित हैं और जब यही बेअसर हो जायेंगे, तो उनके पास कोई चारा नहीं बचेगा।

जो सूक्ष्मजीव प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, वे पहले की तुलना में और भी ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं। जितनी ज्यादा शक्तिशाली एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता वो विकसित कर चुके होते हैं, उतने ही ज्यादा शक्तिशाली वो हो जाते हैं। इसीलिये उन्हें सुपरबग भी कहा जाता है। इनका प्रसारण और आक्रमण और भी भयावह तरीके से होता है।

आखिर ऐसा हुआ क्यों?

यह हुआ प्रकृति की कार्यपद्धति को नहीं समझ पाने और प्राकृतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की वजह से। तथाकथित पदार्थवादी (materialistic) विज्ञान ने जीव शरीर के संचालन में सूक्ष्म शरीर या जीवनी शक्ति के महत्त्व को नजरअंदाज कर दिया और सूक्ष्मजीवों को ही रोग का कारण समझ लिया। और वे जुट गए सूक्ष्मजीवों को मारने में। साधारण तर्कबुद्धि (common sense) को भी उन्होंने किनारे कर दिया कि, जब सूक्ष्मजीव ही रोगों के कारण हैं, तो हर व्यक्ति पर सूक्ष्मजीवों का एक जैसा प्रभाव क्यों नहीं पड़ता? दरअसल, सूक्ष्मजीव तो शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया में सहायक होते हैं और जो सहायक नहीं होते हैं, उनके लिये प्राकृतिक व्यवस्था होती है।

वास्तव में रोगों का मूल कारण है, सूक्ष्म शरीर का अव्यवस्थित हो जाना, अर्थात् शरीर के अंदर जीवनी शक्ति का प्रवाह अव्यवस्थित हो जाना।

इसे पुनः व्यवस्थित करने के लिये सूक्ष्म दवाओं की आवश्यकता होती है, क्योंकि सूक्ष्म तक सूक्ष्म ही पहुँच सकता है।

आज तथाकथित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जिस नैनो टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर शोध ही कर रहा है (एक बार फिर प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज करते हुए), उस सूक्ष्म तकनीक का प्रयोग होमियोपैथी में सदियों से होता आ रहा है, और वह भी प्रकृति के नियमों के अनुकूल।

आज भी असंख्य रोगी जिन पर स्थूल एलोपैथिक मात्राएँ बेअसर हो जाती हैं, वहां भी होम्योपैथिक सूक्ष्म शक्तियां अपना चमत्कार दिखलाती हैं।

तो या तो इंतजार कीजिये, जब हर किसी को होमियोपैथी की शरण में आना ही पड़ेगा या पहले से ही तैयार रहिये। क्योंकि बचाव हमेशा इलाज से बेहतर है। (prevention is always better than cure)

होम्योपैथिक दवाएं केवल उपचार ही नहीं करतीं, बल्कि आने वाले रोगों से बचाव भी करती हैं।

तो जल्द निर्णय लीजिये, कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाये।

याद रखिये, "सत्य वह उपाय है, जिस पर लौट कर आना ही पड़ता है"

यह पोस्ट मूल रूप से मेरे इस ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ:

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